फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से
दिन रात आप की ही बात सोचते हैं हम
शुरुआत कैसे की थी हमने एहतराम से
काग़ज़ पे चार हर्फ़ ही क्या लिख दिए मैंने
साँसे तेरी रुक सी गई मेरे कलाम से
तेरा घडी-घडी घडी की ओर देखना
और याद है बिगड़ना तेरा मेरे नाम से
हमको भी याद हैं वो तेरे ख़ास बहाने
कुछ काम ज़रूरी से ज़रूरी थे शाम से
हंसना तेरा रोना तेरा कनखी से देखना
और कहना ये के काम रखिये अपने काम से
वो वक़्त तो यादों की शक्ल याद रहेंगे
वो दिन नहीं आने अभी कितने भी दाम से
फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से

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