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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Thursday, August 1, 2024

कभी

क़ता:

भूल जाना मुझे आसां तो नहीं 
किसको झूठी क़ता सुनाती है 
क्या अंधेरा भी ऐसे होता है 
दो पहर में दिया बुझाती है 

Bahr (2122 1212 112)
ग़ज़ल:
साँस लेता हूँ हर किसी की तरह 
एक आदत हूँ ज़िंदगी की तरह

आदतन सबको भूल जाता हूँ मैं 
याद आते हो तुम कमी की तरह 

मश्ग़ला बात क्यों करे है तेरी 
जाने पहचाने आदमी की तरह 

मैं ज़मी पर हूँ ख़ाक बन के पड़ा 
तुम फलक पर हो चाँदनी की तरह 

फिर नया दिन है फिर सवाल कई 
फिर मैं उलझा हूँ हर किसी की तरह 

इक दफा फिर से प्यार कर लो कभी 
फिर झटक देना तुम दरी की तरह 

हो ना हो तुमको याद हूँ मैं अभी 
जैसे था तेरा मैं कभी की तरह 

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