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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, March 8, 2024

रूह अफ़्ज़ा

आजकल हम भी तेरी उल्फतों में रहते हैं 
बारहा चारों पहर मयकदों में रहते हैं 
नज़्म, शेरों में ग़ज़ल में और मिसरों में 
तेरी  बातों के कई शायरों में रहते हैं 

तेरे रुखसार पे जो तिल की तरह दिखता है 
ये तेरे हुस्न की ही ख़िदमतों में रहते हैं 

रौशनी के लिए हम छत पे खड़े हैं कबसे 
चाँद के साथ हम भी ज़ुल्मतों में रहते हैं 

ज़रा ख़याल करो देखो कभी हमको भी 
हम तेरे साथ कई दावतों में रहते हैं 

कितनी मसरूफ हैं ज़ुल्फ़ें ये तेरे चेहरे पर 
मुश्किलों से ये कभी  फुर्सतों रहते हैं 

एक छूटी थी अभी सांस तभी देखा तुम्हें 
एक अरसे से यूँ ही मुद्दतों में रहते हैं 

आँख है झील तेरी ज़ुल्फ़ घने बादल हैं 
देख हम कैसे यहाँ क़ुदरतों में रहते हैं 

किसी नशे से कम नहीं आपकी बातें  
आप अक्सर ही मेरी आदतों में रहते हैं 

बात करते हो तो लगता है जैसे रूहअफ़्ज़ा  
नोश फरमाओ जी हम शर्बतों में रहते हैं 

Thursday, March 7, 2024

बेसबब

ऐ ख़ुदा हमको ये फिर से किस जनम का सिला दिया 
मौत मांगी थी मगर फिर ज़िन्दगी से मिला दिया 
हम तो रोते थे के क्यों फिर आ पड़े इस जहान में 
और लोगों ने हमें पुचकार के कुछ पीला दिया 

होश जब आया जहां ने क्या न जाने सिखा दिया 
जो भी सीखा था कभी मैंने वो सब कुछ भुला दिया 
झूठ सच और प्यार नफ़रत शान-ओ-शौक़त एहमियत 
डाल कर मुझमें ये बातें ज़ोर से फिर हिला दिया 

क्या खता मुझसे हुई थी ज़िन्दगी के खेल में 
क्या परख लेनी थी तुझको इस तरह की जेल में 
जब समझ आने लगी थी वो तेरे दर की ख़ुशी 
क्यों भुला कर इस जहां में बेसबब ही बिठा दिया 

Wednesday, March 6, 2024

आवारगी

याद आती जो तेरी तुझसे मिलने आ जाता 
तुम मेरे साथ ही रहते हो तो क्या याद करूँ 
भूल जाने की कोई बात कहाँ बनती है 
याद आते नहीं क्या ये बड़ा सुबूत नहीं 

बात बनती है बनाता हूँ जहां तक हो सके 
मेरी फितरत ही ऐसी है तो मैं क्या ही करूँ 
वैसे चुप रहता हूँ कहता हूँ मैं तो कुछ भी नहीं 
मुझको छेड़ोगे कहने को तो पछताओगे 

मुझे न क़ैद करो मैं कोई परिंदा नहीं 
खुली हवा में साँसों की मुझको आदत है 
बात कहने की हो या फिर हो बात सुनने की 
कोई ना पेश हो सलीके से तो दम घुटता है 

बड़े बेचैन हो रहे हो क्या बात है दोस्त 
तू कलम में भी अगर है तो कोई बात नहीं 
तू अगर चाहे लिख दूँगा तुझे पढूंगा नहीं 
कोई पूछेगा तो कह दूंगा मैं हूँ आवारा  

Monday, March 4, 2024

गुमाँ

उड़ने की बातें करते हो 
और चलने से भी डरते हो 
बदलोगे हाथों की लकीरें 
तुम कैसी बातें करते हो 

इक से हैं तुम और मैं कितने 
फ़र्क़ मगर ये क्यूँ करते हो 

मेरा क़द है तुझसे बेहतर 
बच्चों सी बातें करते हो 

साँसों का ये तुझमे चलना 
इसमें तुम खुद क्या करते हो 

ख़ुद देते हो ख़ुद की मिसालें 
किससे सब समझा करते हो 

खाना पीना जीना मरना 
इसके अलावा क्या करते हो 

दुनिया चलेगी तुम ना रहोगे 
इतना गुमाँ फिर क्यों करते हो 

आजकल

मिलता हूँ इक अजीब शक्सियत से आजकल 
होता हूँ रू-ब-रू मैं हक़ीक़त से आजकल
कहता तो कुछ नहीं है मुझे देखता है वो
शायद मेरी हरकत से है उदास आजकल 

है कौन आईने में मुझसे चाहता है क्या 
चलता नहीं कुछ मेरी इजाज़त से आजकल 

जब देखता हूँ उसको तो नज़रें वो झुका ले 
लगता है के शर्मिंदा बोहोत है वो आजकल 

उसने ये सिखाया के सफर बे-हिसाब है 
मिलता है सुकूँ आज में रहने से आजकल 

इल्तेजा

कोई कहीं कभी किसी जघा तनहा 
मेरे ख्यालों से भी होकर गुज़रेगा 
जिसे मैं देख ही नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 

ये दिल से आवाज़ें आती हैं इतनी मेरे 
के इनको चाहूँ तो भी झूठा कैसे कहूँ 
कोई कशिश तो आकर पास मेरे 
है कानों में क्या कहती है ये किससे कहूँ 

मैं उसका हाथ प्यार से जो हाथ में लूँ 
मुझे यक़ीन है कभी न वो छोड़ेगा 
जिसे मैं देख भी नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 

चले आओ चले आओ 
मुझे ऐसे न तड़पाओ 
यूँ धड़कन में धड़क कर तुम 
रग़ों में ही समा जाओ 

ये इल्तेजा है बेचारे इस दिल की मेरे 
कभी तो बात मेरी भी वो सुन लेगा 
जिसे मैं देख भी नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 


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Female

Friday, March 1, 2024

नहीं मिला

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ये बात तो नहीं के 
कोई नहीं मिला 
लेकिन ये बात भी है 
तुझसा नहीं मिला 

फ़ार्रुख वो ही हुए जो (फ़ार्रुख = fortunate)
रस्तों पे चल पड़े 
हमने तो बोहोत ढूँढा 
रस्ता नहीं मिला 

ऐसी नज़र न देखो 
हम हैं नए अभी 
हमको भी घर यहां पर 
सस्ता नहीं मिला 

दीवारों को नवाज़ा (नवाज़ा = respect)
हद इन्तेहाई की (हद इन्तेहाई = extremity)
कोई भी रंग इनपे 
जचता नहीं मिला 

बनते हैं आसमां में 
जोड़े कहीं मगर 
हमको कोई असल 
वा बस्ता नहीं मिला (वा बस्ता = connected)

तू बे वफ़ा हुआ तो 
ऐसा भी क्या हुआ 
तुमसा कोई भी मुझको 
हँसता नहीं मिला 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...