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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Sunday, July 21, 2024

चाहतों के नसीब

दिल के क़िस्से अजीब होते हैं 
दूर जो हैं क़रीब होते हैं 
ज़िन्दगी ने हमें है सिखलाया 
चाहतों के नसीब होते हैं 

जिनके दिल में कोई नहीं होता 
लोग ऐसे ग़रीब होते हैं 
आस लगती नहीं कभी जिनकी  
वो ही शायद उम्मीद होते हैं 

साथ उनका नहीं रहा फिर भी 
वो ही दिलक़श हबीब होते हैं 
ठीक से हमने जिनको समझा नहीं 
वो बड़े खुश नसीब होते हैं 


Thursday, July 18, 2024

सुहाना सफ़र

बात क्या है के परेशान मुझको होना है 
जो कुछ मिला था यहाँ पर वही तो खोना है 
दिन गुज़ारे हैं सुहाने किसी सफ़र की तरह 
रात आती है देख अब तो मुझे सोना है

ये जो शुमार हैं हिसाब और किताबों में  
इन्हें सुकून से जगना है और ना सोना है 
ये उजालों में ताश कारी करते मिलते हैं 
इनको रातों में अंधेरों में भार ढोना है || दिन गुज़ारे हैं....

फिर उजाला ये नए दिन की तरह आएगा 
आशनाओं से मेरे फिर मुझे मिलाएगा 
जो सो गए थे बीती रात वो भी आएंगे 
यही लिखा है गर्दिशों में यही होना है || दिन गुज़ारे हैं.... 

मगर ये ज़िंदगी है घर है दिन में रहने को 
सुकून से रहो औरों को चैन रहने दो 
धूप आएगी तुझे तोहफे देके जाएगी 
काम तेरा है के मिट्टी को बस भिगोना है || दिन गुज़ारे हैं....  



Wednesday, July 17, 2024

मारा

किसी को आब ने मारा
किसी को प्यास ने मारा
कोई हसरत में जलता था
किसी को यास ने मारा

किसी को यार ने मारा
किसी को खास ने मारा
उसे तो इल्म भी ना था
जिसे एख़्लास ने मारा

किसी एहसास ने मारा
दिल-ए-उदास ने मारा
कभी दिलबर के बातों की
सर-ए-मिठास ने मारा

कभी तो वस्ल ने मारा
कभी फ़िराक़ ने मारा
कभी परवाने को उसके
दिल ए बकवास ने मारा

किसी को काश ने मारा
किसी को ताश ने मारा
जिसे सांसों की आदत थी
उसी को सांस ने मारा

बिजली

आज फिर बारिश हुई 
फिर भी हम रोए नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

करवटों से सिलवटें 
रात भर बढ़ती रही 
फैसलों के वास्ते 
हम कहीं खोए नहीं 

ये भी कैसी बात है जो 
लफ़्ज़ में ढलती नहीं 
अपने दामन मुह छुपाकर 
कबसे हम रोए नहीं 

ये भी सच है इस में तेरी 
और मेरी गलती नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

आज फिर बारिश हुई 
फिर भी हम रोए नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

Monday, July 15, 2024

कुछ कहो (नज़्म)

कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 
यूँ ही वीरान से जज़्बों के ख़ाब में ना रहो 
ख़ाब का क्या है आज है फिर ना होगा कभी 
भूल जाना है एक दिन ख़ाबों को सभी 

ग़ुबार होंगे एक दिन इनको ना सहो 
कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

हाँ कहना नहीं है तो क्या तेरी आँखें चुप हैं 
जगह कम है, और छुपाने को कितना कुछ है 
संभल रही हैं मचलती हुई बातें तेरे दिल में 
मुझे पता है के तुम हो अभी कितनी मुश्किल में 

ना सुनो खुद की, 
और खुद से ही कहो 
कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

तेरा पैगाम देखा जिसमे कुछ भी ना था 
जैसे सोचा मुझे तूने और भुला भी दिया 
मुझे पूछना है तुझसे गर इजाजत करो 
बात करनी है तुझसे अगर हाँ तुम कहो 

कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 
यूँ ही वीरान से जज़्बों के ख़ाब में ना रहो 
ख़ाब का क्या है आज है फिर ना होगा कभी 
भूल जाना है एक दिन ख़ाबों को सभी 
कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

Saturday, July 13, 2024

ख़ुश्बू (नज़्म)

रात की बात अंधेरों में फैल जाती है 
धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है 
इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर 
तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिलने आती है 

तेरी ख़ुश्बू में जाने क्या बात ऐसी रही 
के वो अशरों के बाद भी ज़हन से जाती नहीं 
अब तो आदत ही हो गई है और मेरे लिए 
तुझे महसूस करना कोई बड़ी बात नहीं 

किसके मानिंद है ख़ुश्बू तेरी मैं कैसे कहूँ 
के कोई इत्र कोई फूल ऐसा मिल न सका 
मुस्कराहट तेरे जैसी किसी को मिल ना सकी
और दुनिया में कोई तेरे जैसा खिल न सका 

Thursday, July 4, 2024

याद

भूल गया मैं जाने कब से 
कब से जाने भूल गया 
एक ज़माना था पल भर का 
पल भर पहले भूल गया 

मुझसे झगड़ा करना तय था 
सोच के ही आया था वो 
मेरी बातें सुनकर वो भी 
झगड़ा करना भूल गया 

मैं तो ठहरा एक बेचारा 
इन्सां कितना याद रखे 
गलती तेरी है क्यों की तू 
याद दिलाना भूल गया 

ऐसा क्या हुआ है तुमको 
चेहरा क्यूँ मुरझाया है 
कौन सी बातें याद है तुझको 
मैं तो सब कुछ भूल गया 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...