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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, September 13, 2024

बे-असर

Behr (2122 1212 112)
After

ज़र्फ़-ए-हस्ती तो साज़ गर ही रही
शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही
पोश सारे नक़ाब चेहरों पे
मेरी हर बात बे-असर ही रही

हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते रहो 
ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे रहो 
क्या नतीजे हैं गुफ्तगू से मिले 
तेरी बातें अगर मगर ही रही 

ज़िन्दगी झील हम किनारे रहे 
जाने कितनों के हम सहारे रहे 
बात इतनी सी पालने के लिए 
हम इधर थे तो वो उधर ही रही 

कल वफ़ाओं की रात चलती रही 
जाने उनकी कमी क्युं खलती रही 
आँख दुनिया की जब सितारे हुईं 
अपनी पूछो तो आँख तर ही रही 

ये जो फितरत की बात करते रहे 
अपनी आदत से रोज़ मरते रहे 
जिस्म इन्सां का बस मिला था इन्हें 
रूह फिर भी तो जानवर ही रही 

हमको महफिल में वो बुलाते रहे
सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
बात सबने मेरी सुनी तो मगर 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

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Before 

ज़र्फ़-ए-हस्ती साज़ गर ही रही 
शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही 
नक़ाब पोश सारे चेहरों में 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते हो 
ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे हो 
क्या नतीजे निकलते बातों के 
बात अपनी अगर मगर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

ज़िन्दगी झील हम किनारे हैं 
एक दूजे के हम सहारे हैं 
बात इतनी संभालने के लिए 
मैं इधर था तो वो उधर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

जब वफ़ाओं की बात चलती है 
जाने किसकी कमी सी खलती है 
रात नज़रें सभी सितारे हुए 
मेरी पूछो तो आँख तर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 


फितरतों की ये बात करते हैं 
अपनी आदत से रोज़ मरते हैं 
जिस्म इन्सां का बस मिला इनको 
रूह फिर भी तो जानवर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

महफिलों में मुझे बुलाते रहे
सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
बात सबने मेरी सुनी लेकिन
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

मेरी हर बात बे-असर ही रही 

Thursday, September 12, 2024

राग़िब

राग़िब न कर मेरी रूह को 
अरमाँ ये खो गए हैं 
रहने दो चाँद की ज़द अभी 
वो ख़याल सो गए हैं 

तेरी जीत का मेरी हार का 
हर बार का जो है सिलसिला 
है क़रार अहद-ए-ख़िलाफ़ का 
कहाँ ज़ख्म ये नए हैं 

जो दिला रहे तुझे हौसले 
रख उनसे भी कुछ फ़ासिले 
मुझे क्या पता तेरे दिल में वो 
क्या शुबा सा बो गए हैं 

ये इधर उधर की ही बात है 
कभी साथ है कभी मात है 
अब क्या कहें के वो कौनसा 
दुःख अपना रो गए हैं 

Monday, September 9, 2024

अक्सर

    Behr 2122 2122 2122

After

शायरों की ये बुरी आदत है अक्सर 
क़ैद करते हैं ये कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
फ़लसफ़ों को लिख लिया करते हैं अक्सर 

हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

जिनसे आँखों को मिला पाना है मुश्किल 
वो गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

करते हैं ईमान की बातें जो हमसे 
एक बोली में ही बिक जाते हैं अक्सर 

जिन के घर की हैं दिवारें आसमाँ तक 
उनके घर तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 

जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
आदतें भी वो दे ही जाते हैं अक्सर 

प्यार की तौज़्ही जिन्हें मालूम ना हो  
प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 


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Before

शायरों की बुरी आदत है अक्सर 
क़ैद करते हैं कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
फ़लसफ़ों को ही लिखा करते हैं अक्सर 

हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

जिनसे आँखें मिला पाना है मुश्किल 
गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

करते हैं बातें जो ईमान की हमसे 
एक बोली में बिक जाते हैं अक्सर 

जिनके घर की दीवारें आसमाँ तक 
वो ही तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 
 

जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
आदतें भी वो दे जाते हैं अक्सर 

प्यार क्या है जिन्हें मालूम नहीं है  
प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 

Friday, September 6, 2024

मैं सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ 
मैं सोचता हूँ ये कहना - कितना मुनासिब है 
ये मेरी सोच है कितनी, ये कितनी ग़ैर जाज़िब है  
मैं सोचता हूँ के यहाँ अगर मैं हूँ तो कितना हूँ 
ज़हन में काएनातें हैं और मैं ज़र्रे जितना हूँ
[ग़ैर जाज़िब = unwelcome]

मेरा हर लफ़्ज़ हर इक बात मेरी तो नहीं होती  
मेरे एहसान, बद-कारी से एक हक़त नहीं होती 
ना मेरा है तसव्वुर कुछ ना इख्तियार है कोई 
जो कुछ भी हो रहा है इसके पीछे है तो बस वो ही  

वोही शिरकत कराता है एक ज़र्रे की खिदमत में 
वो ना चाहे तो सूरज भी नहीं आएगा दुनिया मे 
किसी इंसान मे ताकत ये इतनी हो नहीं सकती 
जिसे देखा नहीं उसको ये आँखें रो नहीं सकती 

मैं सोचता हूँ 
मैं सोचता हूँ मुझे कुछ सोचना ही नहीं आता 
ज़हन मे कुछ खुदा है कुछ भुलाया नहीं जाता 
मैं तो मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ उसका 
बिना देखे बिना जाने मैं तलबगार हूँ उसका 
[तलबगार = thirsty] 

साँस आती है 
सुकूं मिलता है, ज़हन चलता है, 
हाथ उठता है, कलम लिखती है, 
आँख से देख जुबां कहती है
और मैं सोचता हूँ कि "मैं" सोचता हूँ 

Thursday, September 5, 2024

तनहाई

Bahr (2122 122 1212 22)

याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा 
तेरी मर्ज़ी न थी तक़दीर भी है शर्मिंदा 
माना मुश्किल है मगर तू किसे बताएगा 

लाज़मी है के नहीं छोर कोई चाहत के 
क्या दबा के इन्हें रातों में तू सो पायेगा 

बात बचकानी सी मासूमियत कि करते हो 
चाह लोगे जिसे दिल से तुझे वो चाहेगा

एक दिन तू भी तो हो जाएगा ख़ुदा हाफ़िज़ 
कोई फिर तुझसा ही रोयेगा भूल जाएगा 

याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा

 

Wednesday, September 4, 2024

तो क्या

अगर तू है तो क्या है 
अगर मैं हूँ तो क्या 
ये मजमा बे पनाह है 
मैं ना रहूँ तो क्या 
[मजमा = भीड़]

कहाँ ख़ुश है तू फिर भी 
तुझे कितना मिला
मिले हमें मिले जो 
जो ना मिले तो क्या 

ख़्वाहिशें खिल ना पाई 
सिलसिला-ए-गिला 
कभी मिले नहीं जो  
जुदा हुए तो क्या 

ये मुमकिन है के तुझसे 
प्यार उसको न हो 
मगर फिर सोचता हूं
अगर हुआ तो क्या 

चंद टुकड़ों की खातिर  
ज़दें दिखला मुझे 
जो हासिल कर लिया तो 
न कर पाए तो क्या 

हजारों चाँद तारे 
अकेला आसमाँ 
अगर ये आसमाँ में
ना होते भी तो क्या 

रोज़ बातें वही हैं 
नया कुछ भी नहीं 
जुगाली आदतों की 
अगर कर ली तो क्या 

मिला ऐसा ना कोई 
कहे जो फैसला 
मेरे हक़ में हुआ है 
ना होता भी तो क्या 

रवायत है के दुनिया 
वजाहतों से है 
है अफ़सुर्दा ज़माना 
ख़ुदा भी है तो क्या 
[रवायत = रिवाज़, वजाहत = आदर, अफ़सुर्दा = बे-हाल]
 
ये बातें कह रहा हूँ 
तो लगता है मुझे 
मुझे सबने सुना है 
न भी सुना तो क्या

Sunday, September 1, 2024

एकाकार

छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 

भय सू थर थर काँप रहौ सब 
मरणौ है सबकु अब की तब 
या मन कैसौ ई सरीर से 
करीहें बेड़ा पार 

ना हुइहें एकाकार

मैं आपन भरम जाल बनावे 
सत सुर बा केहु ना सुनावै 
सत जेहि समझे मन तेही मैं के 
पूरन हो संस्कार 

ना होइहें एकाकार 
छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 
ना हुइहें एकाकार 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...