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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Sunday, December 8, 2024

अलफ़ाज़

Bahr: 2122-1122-1122-112


कौन पढ़ता है क़िताबों के ये औराक़ सभी
याद रहते हैं किसे प्यार के आग़ाज़ कभी
राब्ता हैं यूँ सभी हम से हो बर्बाद ये दिल
बस तमाशे की तरह देखते अंजाम सभी

दिल को पत्थर का बना कर किसी बच्चे कि तरह
आग रगड़न से लगाते हैं ये मुश्ताक़ सभी

कश म कश दिल में लिए जो भी मिला कहता मुझे
दिल कशी से ही तो होती है ये शुर वात सभी

दिल कि चोटों से निखर आएं मेरे नक़्श नयन
हर्ज क्या है जो तराशे कोई चट्टान कभी

मैं तसव्वुर कि ही बातों से महक जाऊ यहाँ
वो हक़ीक़त में नहीं होता है इफ़रात कभी
[तसव्वुर = imagination , इफ़रात = satisfy]

गर्मी ए दिल पे ही नाचेगा ये पारे का जुआ
ये हैं 'ज़ाहिर' दिल ए बर्बाद के अलफ़ाज़ सभी

Friday, December 6, 2024

अजनबी

Bahr: 212-212-212-212


हम भि हैं अजनबी तुम भि हो अजनबी
रास्ते अजनबी मंज़िलें अजनबी
सोचा हम ही चलो बात कर लें जहाँ
है सफ़र अजनबी हर नज़र अजनबी

हमने सोचा बोहोत और पाया यही
हर किसी तौर पर हर कोई अजनबी
ज़ाइदों के लिए बारहा ही रहा
है ज़हन अजनबी और बदन अजनबी
[ज़ाइद = छोटे बच्चे, बारहा = हमेशा से]

ये जो पहचान है ये भी मिट जाएगी
दर-बदर रूह भटकेगी फिर अजनबी
दीद की बात कहता है 'ज़ाहिर' सुनो
ज़िन्दगी अजनबी मौत भी अजनबी
[दीद = philosophy]

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
सीख लेती है एहले हुनर अजनबी
घर बसाने की खातिर चली जाती है
हो जहाँ पर की दीवारो-दर अजनबी

हाल तेरा जो है वो पता है मुझे
माना तकदीर का है ज़हर अजनबी
छोड़ दो वक़्त को वक़्त के हाल पर
है फ़िकर अजनबी चारगर अजनबी
[चारगर = solution दिलाने वाला]

Thursday, December 5, 2024

हद करते हो

Bahr: 22-22-22-22

मेरी बातें ज़द करते हो 
अपनी तो लज़्ज़त करते हो 
कैसे मानोगे के तुम तो 
हद करते हो हद करते हो

देखो अब हम घर आये हैं
दिन काला हम कर आये हैं
अंगड़ाई तुम क्यूँ भरते हो
हद करते हो हद करते हो

मेहताबी है आँखें तेरी
दानाई हैं बातें मेरी
रोशन रातें गुम करते हो
हद करते हो हद करते हो

तौबा हमने की है दिल से
धड़कन थामी है मुश्किल से
क्यूँ धड़कन गड़बड़ करते हो
हद करते हो हद करते हो

मंज़िल जो थी अब रस्ता है
अब जब सब लगता सस्ता है
अब किस मंज़िल से डरते हो
हद करते हो हद करते हो

'ज़ाहिर' चाहत जब है दिल में
बैठे हो तुम किस मुश्किल में
हद की बातें क्यूँ करते हो
हद करते हो हद करते हो

जब भी ग़ज़लें पढ़ता हूँ मैं
या कह लो के मढ़ता हूँ मैं 
वावाही का दम भरते हो 
हद करते हो हद करते हो

Wednesday, December 4, 2024

याद आना चाहता हूँ

असली शायर: फ़हमी बदायूनी 

मैं बस के ये बताना चाहता हूँ
मैं तुमसे दूर जाना चाहता हूँ
के हिज्र में किसी कमी की तरह
मैं तुमको याद आना चाहता हूँ

ये तुमसे दिल धड़क रहा है मेरा 
मैं इसका मेहनताना चाहता हूँ

ये कैसा वक़्त हो चला है अभी 
मैं वो अपना ज़माना चाहता हूँ

ये किसने बद्तमीज़ हद बनाई
मैं इसके पार जाना चाहता हूँ

बस एक शै पे क्या उछलते हो तुम
मैं तुमसे मात खाना चाहता हूँ

तुम मेरे हो के तुम मेरे ही तो हो 
'ज़ाहिर' है तुमको पाना चाहता हूँ

Tuesday, December 3, 2024

पुराना

Bahr: 1222-1222-122


मेरा कहना अभी खलता नहीं है
कोई मुझसे यहां जलता नहीं है
किसी से कल कोई ये कह रहा था
पुराना नोट अब चलता नहीं है

ये किन राहों पे है निकला ज़माना
के सूरज शाम को ढलता नहीं है

ये कैसा आदमी बेदर्द है के
लगी है चोट पर मलता नहीं है

पुराना ही तो कहलायेगा मुझसा
हवा के साथ जो चलता नहीं है

मगर अब तक नहीं बदला वो ये के
कभी दिन मौत का टलता नहीं है

दफ़न होकर जिसम पिघला तो है पर
न जाने क्यूँ ये दिल गलता नहीं है

Monday, December 2, 2024

बस ख़्वाब है

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 
सोए हुए हम तुम सभी 
झूठे सभी जज़्बात हैं 

इस नींद में थकना भी है 
रोना भी है हँसना भी है 
इस नींद में जगना भी है 
फिर नींद में सोना भी है 

ख़्वाबों के भी कुछ ख़्वाब हैं 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

ये ख़्वाब भी है कमाल का 
है मलाल खुद ही सवाल का 
है हयात का तेज़ाब का 
है नशा ये जैसे शराब का 

ख़्वाबों की ये इक किताब है 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

Saturday, November 30, 2024

बात इतनी सी है

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

क्या मुनासिब है क्या है रवायत यहाँ 
पीढ़ी दर पीढ़ियों तक जो कहता रहा 
पर मुनासिब था तब जो ये किसको पता था 
मुनासिब रहेगा हमेशा यहाँ 
बात इतनी सी है 

है मेरी नाक तुझसी मेरी आँख तुझसी 
मेरे हाथ तुझसे मेरी भूख तुझसी 
धरम और मज़हब ने कब तुझसे मुझको 
अलग था बताया ज़रा ये बता 
बात इतनी सी है 

चाँद सूरज सितारे या फिर आसमां 
ज़िन्दगी सबको देते हैं इक सी यहाँ  
कुइ पंछी कभी भी किसी और पंछी 
को कहता नहीं मैं यहाँ तू वहाँ 
बात इतनी सी है 

जीभ पे ज़ायक़ा तो सभी का है इक सा 
नमक कोई मीठा तो कहता नहीं 
ये दिल चाहे कितनी करे ऐहतरामी 
मगर बे लिहाज़ी भी सेहता नहीं 
बात इतनी सी है 

तू सच है तो सच ये भी है के कोई 
झूठ की डोर को है संभाले हुए 
अगर झूठ ही न हुआ करता तो क्या तू 
दीखता कभी दिल जलाते हुए 
बात इतनी सी है 

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...