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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Sunday, August 4, 2024

आते जाते

मुझसे,
बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2
कैसे,
मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
मेरे, 
दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 

हरदम ही गुनगुनाना हरदम ही मुसकुराना 
तुम कैसे ढूंढते हो हंसने का कोई बहाना 
अच्छा,
अब तो बताओ के तुम कैसे फ़रमाते
अगर मैं रूठ जाती मुझको कैसे मनाते 

कैसे,
मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
मेरे, 
दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 
मुझसे,
बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2

पैग़ाम देखा तेरा तो फिर याद आ गया रे 
मैं कुछ,
भूल गया गलती से और पकड़ा गया रे 
फिर सोचा अब तो तुझको मनाना पड़ेगा 
और ये गीत बन गया देखो मनाते मनाते 

मुझसे,
बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2
कैसे,
मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
मेरे, 
दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 

हमनशीं

ये रातें, दिल की बातें घुल गई हैं ज़िंदगी में
बड़े काम आएगी ये हसीं बातें आशिक़ी में

ये रातें, दिल की बातें ...

मंज़र तो आईना है धड़कते से दो दिलों का 
ये दिल सुन रहा है एहतराम मंजिलों का
उलझनों में मत उलझना बोहोत कम ज़िंदगी है 
अपना प्यार बंदगी है बेशुमार ज़िंदगी है 

ये रातें, दिल की बातें ...

जब अंधेरा आए तो तुम मेरे साथ साथ रहना 
हम साथी हर जनम के इस जनम भी साथ है ना 
ता उम्र रहना चाहे दिल ऐसी बेखुदी में 
मैं तेरी हमसफ़र हूँ तू मेरा हमनशीं है 

ये रातें, दिल की बातें घुल गई हैं ज़िंदगी में
बड़े काम आएगी ये हसीं बातें आशिक़ी में

ये रातें, दिल की बातें ...
ये रातें, दिल की बातें ...

Duet Song: Female, Male, Both

Saturday, August 3, 2024

जवाब

क़िस्सों को कहानी में ढलते हुए देखा 
और ऐसे हक़ीक़त को जलते हुए देखा 

'इंसान हूँ' इंसान ये कहते हैं सर-ए-आम 
कितनों को मैंने जिस्म बदलते हुए देखा 

करते हैं जो शफ़्क़त की बातें बड़ी बड़ी 
एक फूल उन्हें कल ही कुचलते हुए देखा
 [ शफ़्क़त = करुणा, compassion ]

कल रात से भूखा था मैं अब भूख मर गई  
इक तिफ्ल को खाने को तरसते हुए देखा
 [ तिफ़्ल = बच्चा, child ]

एक बाप सर झुका के सुन रहा था कोई बात 
उसे खून के प्यालों को निगलते हुए देखा 

नज़रों के सवालों का जब जवाब ना मिला 
मैंने तुझे नज़रों से उतरते हुए देखा 

Thursday, August 1, 2024

कभी

क़ता:

भूल जाना मुझे आसां तो नहीं 
किसको झूठी क़ता सुनाती है 
क्या अंधेरा भी ऐसे होता है 
दो पहर में दिया बुझाती है 

Bahr (2122 1212 112)
ग़ज़ल:
साँस लेता हूँ हर किसी की तरह 
एक आदत हूँ ज़िंदगी की तरह

आदतन सबको भूल जाता हूँ मैं 
याद आते हो तुम कमी की तरह 

मश्ग़ला बात क्यों करे है तेरी 
जाने पहचाने आदमी की तरह 

मैं ज़मी पर हूँ ख़ाक बन के पड़ा 
तुम फलक पर हो चाँदनी की तरह 

फिर नया दिन है फिर सवाल कई 
फिर मैं उलझा हूँ हर किसी की तरह 

इक दफा फिर से प्यार कर लो कभी 
फिर झटक देना तुम दरी की तरह 

हो ना हो तुमको याद हूँ मैं अभी 
जैसे था तेरा मैं कभी की तरह 

Monday, July 29, 2024

कोशिशें

आदतों को आदतों की आदतें होती रही 
ता उमर ऐसे गुलों की बारिशें होती रही 
इतना भी क्या सोचना सोचे हुए हंगाम पे 
ज़िंदगी आदत तले अपनी बसर होती रही 

हमने ना सोचा ना समझा ना ही पछताए कभी 
सोच कर बैठे थे जो उनको खलिश होती रही 

हर क़दम पर पाएमानी की ज़रूरत थी उन्हें 
हर क़दम पर जिनके हरदम ताइदी होती रही 

वो नहीं नादान जिनके पर अभी आए नहीं 
वो इशारों मे हैं जिनकी परवरिश होती रही 

एक बच्चे नें सिखाया ज़िंदगी का फ़लसफ़ा 
जब तलक वो उठ ना पाया कोशिशें होती रही 

Wednesday, July 24, 2024

तुम्हारे जैसा

यही सच है, सच है 
यही सच है मैं नहीं हूँ तुम्हारे जैसा 
कौन होता है ज़िन्दगी में किसीके जैसा 
इक दफ़ा खुद को आइना तो दिखाओ ज़रा 
इल्म होगा तुम्हें तू भी नहीं तुम्हारे जैसा 

तुमने इक बात कही थी एक दिन पहले 
आज कहते हो वाक़या न था कोई ऐसा 
फिर बड़ी देर तक सोचा किया तुमको हमने 
और मुझे मिल न सका कोई तुम्हारे जैसा 

आपकी बात ख़यालों को तो हिजाब नहीं 
झूठ सच है मगर सच का कोई जवाब नहीं 
इक तरफ दार ही ले लो सताइश के लिए 
जो कहेगा नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा

यही सच है, सच है 
यही सच है मैं नहीं हूँ तुम्हारे जैसा  

Monday, July 22, 2024

बेदम

हम तो हुए नहीं थे तुमसे ख़फ़ा कभी 
किस बात का लगा है मजमा यहाँ अभी 
हम आज भी वही हैं ख़ामोश दिल की सुन 
आवाज़ आ रही है दिल से दबी दबी 

पेहचान तुझसे कोई माना कभी न थी 
लगते हो फिर भी मेरे मेहरम कभी कभी 
खुशबू को तो नवाज़िश तुमसे न मिल सकी
आएगी पास तेरे फिर भी कभी कभी 

हर साँस में बिठाकर जीते हैं तुझको हम 
रखते हो तुम भी हमको बेदम कभी कभी 
नज़रें नहीं मिलाकर बेचैन करते हो 
नज़रें मिला के कर दो बे ग़म कभी कभी 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...