About Me

My photo
I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Monday, December 2, 2024

बस ख़्वाब है

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 
सोए हुए हम तुम सभी 
झूठे सभी जज़्बात हैं 

इस नींद में थकना भी है 
रोना भी है हँसना भी है 
इस नींद में जगना भी है 
फिर नींद में सोना भी है 

ख़्वाबों के भी कुछ ख़्वाब हैं 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

ये ख़्वाब भी है कमाल का 
है मलाल खुद ही सवाल का 
है हयात का तेज़ाब का 
है नशा ये जैसे शराब का 

ख़्वाबों की ये इक किताब है 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

Saturday, November 30, 2024

बात इतनी सी है

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

क्या मुनासिब है क्या है रवायत यहाँ 
पीढ़ी दर पीढ़ियों तक जो कहता रहा 
पर मुनासिब था तब जो ये किसको पता था 
मुनासिब रहेगा हमेशा यहाँ 
बात इतनी सी है 

है मेरी नाक तुझसी मेरी आँख तुझसी 
मेरे हाथ तुझसे मेरी भूख तुझसी 
धरम और मज़हब ने कब तुझसे मुझको 
अलग था बताया ज़रा ये बता 
बात इतनी सी है 

चाँद सूरज सितारे या फिर आसमां 
ज़िन्दगी सबको देते हैं इक सी यहाँ  
कुइ पंछी कभी भी किसी और पंछी 
को कहता नहीं मैं यहाँ तू वहाँ 
बात इतनी सी है 

जीभ पे ज़ायक़ा तो सभी का है इक सा 
नमक कोई मीठा तो कहता नहीं 
ये दिल चाहे कितनी करे ऐहतरामी 
मगर बे लिहाज़ी भी सेहता नहीं 
बात इतनी सी है 

तू सच है तो सच ये भी है के कोई 
झूठ की डोर को है संभाले हुए 
अगर झूठ ही न हुआ करता तो क्या तू 
दीखता कभी दिल जलाते हुए 
बात इतनी सी है 

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

Thursday, November 28, 2024

ख़याल

Bahr: 11212-11212-11212-11212

जो ज़हन गिरफ़्त मलाल थे
        कभी आसुओं में वो बह गए
जो क़लम किये थे ख़याल हमने 
        किसी किताब में रह गए
[ज़हन गिरफ़्त = hidden in mind]

वो निशानियाँ वो इनायतें 
        तेरी याद से तो मिले मगर
वो जो पल गुज़ारे थे साथ में 
        वो उसी मक़ाम पे रह गए
[इनायतें = respects]

जो भी कहना था वो ना कह सके 
        यूँ के हम भी ऐसे अजीब थे
यूँ के तुम भी कैसे अजीब थे 
        जो ना कहना था वोही कह गए

इसे प्यार हम ना कहें तो फिर 
        ये बता ज़रा इसे क्या कहें
तेरी ताकिदों के लिहाज़ में 
        बिलिहाज बात भी सह गए
[ताकिदों = warnings]

तेरा साथ थी मेरी जुस्तजू 
        मगर इत्तफ़ाक़ की बात है
तेरी जुस्तजू में चले थे हम 
        तेरी जुस्तजू में ही रह गए
[जुस्तजू = aspirations]
 
जो ज़हन गिरफ़्त मलाल थे
        कभी आसुओं में वो बह गए
जो क़लम किये थे ख़याल हमने 
        किसी क़िताब में रह गए

Tuesday, November 26, 2024

लग रहा है

वक्त गुज़रा हुआ सा लग रहा है
और सब कुछ हुआ सा लग रहा है

उनको देखा है जबसे दिल पे मेरे
कोई जादू हुआ सा लग रहा है

तेरी खुशबू जो आई आसमाँ से
तूने मुझको छुआ सा लग रहा है

तंज़ सी लग रही है सब की कही
तेरा कहना दुआ सा लग रहा है

दिल के चाहत की बात क्या ही कहें
एक अंधा कुआं सा लग रहा है

जाने पहचाने मेरे सब हैं यहाँ 
कोई छूटा हुआ सा लग रहा है

देख लेता बिछड़ना मैं भी तेरा
आंख में कुछ धुआं सा लग रहा है


Tuesday, November 19, 2024

जानवर

ये कौन है जो मुझको बांध बांध लाता है 
ये कौन है जो मुझको रोज़ बेच आता है
नफे की चाहतों में कौन यूँ दिवाना है 
ये कौन है जो मुझको केमिया खिलाता है 

ये किसने मुझको जंगलों से खैंच लाया है 
ये किसने बार बार ज़ुल्म मुझपे ढाया है 
ये कौन ब्रह्म ब्रह्म कहके ढोंग करता है 
ये कौन है जो रात दिन मुझे सताता है

ये कौन है जो अपने पाँव पे खड़ा नहीं 
ये कौन है जो मेरी जूतियाँ बनाता है 
निचोड़ कर के मेरी चर्बी खूब फूले है 
ये कौन झूठ मूठ माँ मुझे बुलाता है 

मैं सोचती हूँ सोचना इसे कब आएगा 
ये कब तलक यूँ होश में ही आ न पाएगा 
के कैसे बिन मेरे ये रात दिन गुज़ारेगा 
ये कर्ज कैसे मेरे दूध के उतारेगा 

मैं जानवर हूँ झूठ मूठ मुझको माँ ना कहो 
ये जो क़ुदरत है इसके साये तले तुम भी रहो 
ज़रा कोशिश तो करो खुद के दम पे जीने की 
अपनी बैसाखी बना तुम मुझे कुरबाँ ना करो 

है तुमसे एक गुज़ारिश ये मुझे कहने दो 
के मुझे धूप छाँव बर्फ खुद ही सहने दो 
मुझे नहीं हैं ख्वाहिशें तुम्हारे चौखट की 
मैं जानवर हूँ मुझे जानवर ही रहने दो 

Sunday, November 17, 2024

खुदकुशी

Bahr:
  • 1222
  • 1222
  • 122

  • ये किसने खुदकुशी की बात कह दी  
    जो ज़िम्मेदारियों से डर चुका है ?
    वो बातें बे वजह दोहरा रहा है 
    जो करना है उसे वो कर चुका है 

    नहीं है जड़ से कोई रब्त उसका 
    वो अपनी शाख़ से ही झर चुका है 
    ज़रूरत अब नहीं उसकी किसीको 
    वो पीला पड़ गया है सड़ चुका है 

    नहीं है पीठ में उसके भी हड्डी 
    तभी उसका यहाँ पे सर झुका है 
    तड़पता है वो साँसों के लिए तो 
    उसे कह दे कोई वो मर चुका है 

    क़वाद

    Bahr: 
  • 12122
  • 12122

  • जिसे समझता था मैं सहारा 
    ये असलियत में तो वो नहीं है 
    जिसे समझता था मैं मोहब्बत 
    नहीं है सच में ये वो नहीं है 

    कहीं तो होगी रुहे रुमानी 
    जहाँ के तल्ख़ी बसी नहीं हो 
    मगर यहाँ के हरेक शय में 
    तो नफ़्ज़ परती भरी हुई है  

    कहीं तो हो इब्तिदा सुहानी 
    के जिसके अंजाम हों सुहाने 
    चराग़ी आँखें जला के देखी 
    मगर नहीं है कहीं नहीं है 

    पहाड़ झरना ये बहता पानी 
    सभी कि है इक सि ही कहानी 
    सभी को जीने की ख्वाहिशें हैं 
    सभी की नफ़्ज़ें दबी हुई हैं

    न जाने है कौन सी निशानी
    हैं ज़र्द के ज़र्द बिन कहानी
    जो दिल ने चाहा था ज़िन्दगी से
    जो खाब देखे ये वो नहीं हैं 

    है कौन बैठा मेरे ज़हन में 
    के जिसके मंसूबों से हूँ चलता 
    है क्या ज़हन में जो चाहता है 
    किसी को भी ना हो इत्मिनानी 

    सराब की सी है ज़िंदगानी
    दिखे जो है ना दिखे नहीं है 
    यही बुढ़ापा यही जवानी 
    क़वाद हैं पर लिखे नहीं हैं 
     

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...