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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, June 28, 2024

फिर वो बात हो

Bahr: 
  • 212
  • 12
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  • फिर वो दौर हो फिर वो बात हो 
    हमसफ़र वही फिर वो साथ हो 

    याद सब नहीं कुछ तो याद है 
    बात में तेरी कुछ तो बात है 
    बात कुछ मगर जो ना हो सकी 
    बात फिर वही तेरे साथ हो || फिर वो दौर हो

    और ही कहीं आओ हम चलें 
    वक़्त के परे हम जहां मिलें 
    यूँ उसी जघा तुझसे बात हो 
    हाथ में मेरे तेरा हाथ हो || फिर वो दौर हो

    आओ छोड़ दें अपनी तल्खियाँ 
    आओ हम करें दूर दूरियां 
    गुफ़्तगू में भी एहतियात हो 
    हम शकल सा ही दिल में प्यार हों  || फिर वो दौर हो


    ==================================



    फिर वो दौर हो फिर वो बात हो 
    हमसफ़र वही फिर वो साथ हो 

    याद सब नहीं कुछ तो याद है 
    बात में तेरी कुछ तो बात है 
    बात कुछ मगर जो ना हो सकी 
    बात फिर वही तेरे साथ हो || फिर वो दौर हो

    और ही कहीं आओ हम चलें 
    वक़्त के परे हम जहां मिलें 
    यूँ किसी जघा मुलाक़ात हो 
    हाथ में मेरे तेरा हाथ हो || फिर वो दौर हो

    आओ छोड़ दें अपनी तल्खियाँ 
    आओ फिर करें नज़दीकियाँ 
    गुफ़्तगू में भी एहतियात हो 
    दिल मे एक से जज़्बात हों || फिर वो दौर हो

    आखिरत मेरी काश यूँ रहे 
    दर्द हर तरह बे असर रहे 
    इश्क था तुझे इकरार हो 
    मौत तब मिले फिर हयात हो || फिर वो दौर हो

    -- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे 

    Wednesday, June 26, 2024

    हुजूम

    रात ढल गई दिन गुज़र गए 
    और बेवझा हम ठहर गए 
    क्या हुजूम था अपने नाम का 
    हम ना हम रहे हम जो थम गए 

    सूनापन मिला था नसीब में 
    वो ना भर सके बस उलझ गए 

    कोशिशें तो की अपनी ओर से 
    फिर भी दौड़ में हम पिछड़ गए 

    तय हुआ था जो वो ज़ुबान थी 
    अपनी बात से वो मुकर गए 

    इक सवाल था लाजवाब था 
    तेरे बिन कहे हम समझ गए 

    चंद वक़्त को जो खड़े रहे 
    जाने वो कहाँ और किधर गए 

    वक़्त की तरह सब मिले हमें 
    रेत की तरह सब फ़िसल गए 

    हमको चाह थी बस सुकून की 
    खाब ही तो थे अब बिखर गए 


    -- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे 

    Saturday, June 22, 2024

    गुलशन

    भीनी सी सौंधी हवा है 
    मन को जो महका रही है 
    बोझिल सी साँसों को मेरी 
    हौले से बहला रही है 

    सूरज की किरणों को छूकर 
    खिल जाए बाग़ों की कलियाँ 
    जज़्बों को मेरे जगाकर 
    महके इरादों की गलियाँ
    दिलकश हवाएं भी इजहार से 
    गुलशन को लहका रही हैं ||  भीनी सी सौंधी हवा है  

    क़ुदरत बनाती है नमे 
    पंछी उसे गुनगुनाते 
    मदहोश करता है आलम 
    धुन ये सुनाते सुनाते 
    बादल की लड़ियाँ आकाश के
    नज़ारों में इठला रही हैं

    भीनी सी सौंधी हवा है 
    मन को जो महका रही है 
    बोझिल सी साँसों को मेरी 
    हौले से बहला रही है 

    -- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे 

    Friday, June 21, 2024

    आब

    आसमानों से आता है हर हुनर ​​का ये बानी है (बनाने वाला - architect)

    ये सच्ची बात है देखो हर किसी ने ये मानी है

    ये अपनी चाल से काटे ज़माने भर की उलझन को

    ज़ेहन में याद रख जाए बड़ा ये दास्तानी है


    किसी पैग़ाम से मिल कर ये हमदम की निशानी है

    इसे जो पढ़ सके कोई तो फिर ये रा'ए ज़ानी है (टिप्पणी - commentary )

    कोई भी छोड़ ना पाया अभी तक इस अकेले को

    बहुत नायाब है देखो बड़ा ये पास्तानी है (प्राचीन - antique)


    जहां पर ये नहीं होता वहां आनी ना जानी है

    जहां भी ये बिखर जाए वहां बस शादमानी है (खुशी - joy)

    ये हरदम राज करता है महफ़िलों की ये रानी है

    बिना इसके बड़ी सूखी बदगुमा मेज़बानी है


    इसे दे दो ज़रा इज़्ज़त कोई इसका ना सानी है

    ज़िन्दगी जब से चलती है बात इतनी पुरानी है

    ये पानी है ये पानी है बड़ा ही खान दानी है

    बुढ़ापे में दवा सा है जवानों की जवानी है


    हयात-ए-आब पानी है ज़हर की राख पानी है 

    ज़िंदगी के लिए पानी मौत के बाद पानी है 

    ज़मी से है फ़लक तक ज़िंदगी तो बस ये पानी है 

    ज़मी से है फ़लक तक ज़िंदगी तो बस ये पानी है 

    दिखावा

    ये दुनिया है दिखावा 
    है दिखावा है दिखावा है

    दिखावा है ये दुनिया है 
    ये दुनिया बस दिखावा है

    दिखावा ही दिखाना है
    ज़बर्दस्ती बताना है
    नुमाइश है सर-ए-बाज़ार
    खुद को बेच खाना है ।। दिखावा है ये ...

    असल में जो किया ना हो
    उसे कहके जताना है
    किसी को चोट पोहचा कर
    इनायत कर गिनाना है ।। दिखावा है ये ...

    फ़रामोशी है ख़ामोशी
    है एहसानों की तकदीरें
    मदद लेकर किसी की भी 
    सदा को भूल जाना है ।। दिखावा है ये ...

    ना ढब कोई रहा हम दर्द
    का ना दुश्मनी का ढब
    जिन्हे कोसा किया था कल
    हाथ उनसे मिलाना है ।। दिखावा है ये ...

    रवैया भी दिखावा है
    ये पहनवा दिखावा है
    यहां काफिर का काफिर गाह
    में रहना दिखावा है ।। दिखावा है ये ...

    ये जज़्बाती हुए जाते हैं
    सबके सामने देखो
    जो आँखों से गिरे जाते हैं 
    आँसू भी दिखावा है ।। दिखावा है ये ...

    मोहब्बत भी दिखावा है
    अदावट भी दिखावा है
    जुबां की बात को कर के 
    दिखाना भी दिखावा है ।। दिखावा है ये ...

    ये दुनिया है दिखावा 
    है दिखावा है दिखावा है

    दिखावा है ये दुनिया है 
    ये दुनिया बस दिखावा है

    Tuesday, June 18, 2024

    माटी

    जीवन क्या है मन की माटी 
    मन की माटी तन की माटी 

    चाहे कागज हो या पाटी 
    या फिर पर्बत या फिर घाटी 
    तरुवर हो फल चाहे पाती 
    सबके अंदर में है माटी 

    माटी खाकर बनती माटी 
    माटी बनकर खाती माटी 
    सोना कंकर गोबर चांदी 
    सब तो माटी है भई माटी 
    माटी से मिलकर है माटी 
    माटी के बिन सब है माटी 

    इसकी कोई नहीं है जाती 
    ये बस माटी है बस माटी 
    माटी माटी से उठी रे 
    माटी माटी मे मिल जानी

    जीवन क्या है मन की माटी 
    मन की माटी तन की माटी 
    माटी माटी से उठी रे 
    माटी माटी मे मिल जानी 

    Monday, June 17, 2024

    मन कंगन

    मतवारा मोरा मन 
    चंचल जैसे कंगन
    मतवारा मोरा मन 

    मन चाहत जो भी नाहि मिले 
    मिल जाये कदर वा की ना करे 
    अभिमानी प्रपंची हठ ये धरे 
    और बाजे छन छन छन 

    मतवारा मोरा मन 
    चंचल जैसे कंगन
    मतवारा मोरा मन 

    जब ध्यान करे और ज्ञान धरे 
    तब एक अग्र चित हाथ धरे 
    मन बाहर से आघात करे 
    और डोले यह आसन 

    मतवारा मोरा मन 
    चंचल जैसे कंगन
    मतवारा मोरा मन 

    यह चंचल और चपल मन है 
    चिंतन इसको प्रति पल पल है 
    आकाश में घिर घिर आये 
    जैसे कारे बादल 

    मतवारा मोरा मन 
    चंचल जैसे कंगन
    मतवारा मोरा मन 

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...