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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Sunday, September 1, 2024

एकाकार

छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 

भय सू थर थर काँप रहौ सब 
मरणौ है सबकु अब की तब 
या मन कैसौ ई सरीर से 
करीहें बेड़ा पार 

ना हुइहें एकाकार

मैं आपन भरम जाल बनावे 
सत सुर बा केहु ना सुनावै 
सत जेहि समझे मन तेही मैं के 
पूरन हो संस्कार 

ना होइहें एकाकार 
छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 
ना हुइहें एकाकार 

Friday, August 30, 2024

ज़रा मुश्किल

Bahr: 1222 1222 1222 1222

ये सूरज आसमा में तो क़मर से रोज़ मिलता है  
मगर बादल जो आए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 

ये माना दिल में रहते हो मेरी साँसों में बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पे खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों में दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है

अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 



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ये सूरज रोज बे नागे चाँद को रोशन करता है  
मगर बादल आ जाए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 
ये माना दिल मे रहते हो मेरी साँसों मे बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पर खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 
दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों मे दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है
अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

मैं इंसान हूँ

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ
खुदी पे मैं सबसे महरबान हूँ 
फ़रिश्ता सा हूँ मैं किसी की नज़र में 
किसी की नज़र में मैं शैतान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

अगर कोई कहता है मैं नासमझ हूँ 
तो खुद को समझता मैं नादान हूँ 
कभी हूँ शफ़ाक़त कभी बेवफ़ा हूँ 
कभी रंजिशी का मैं इलज़ाम हूँ 

कभी देवताओं का ऐलान हूँ मैं 
कभी खुद खुदा का मैं मुख्तार हूँ 
कभी फ़िक्र-ए-खुद हूँ कभी मस्त बे हिस 
कभी खुद पे खुद ही मैं हैरान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

कभी मैं शराफ़त की हूँ बानगी तो 
कभी बद-तमीज़ी का परवान हूँ 
जूनून-ए-नफ़ा है कभी मेरे सर पे 
नतीजन यक़ीनन मैं नुक्सान हूँ 

कभी बे ग़रज़ धूप सी इक किरण हूँ 
कभी जंगलों का मैं तूफ़ान हूँ 
है ख्वाहिश ख़ुशी की मुझे ज़िन्दगी में 
ख़ुशी के लिए मैं परेशान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

Wednesday, August 28, 2024

बोहोत ...

आज बारिश के हैं आसार बोहोत 
अश्क़ आँखों में हैं लाचार बोहोत 
पत्थरों पर ही है शहर ये खड़ा 
और पानी के तलबग़ार बोहोत 

गाँव में मेरे बेक़रारी है 
मेरी नज़रें हैं शर्मसार बोहोत 
कैसी तहज़ीब क्या सियासत है 
जिस तरफ देखो हैं मक्कार बोहोत

दिखाई मैंने चाँद की कलियाँ 
उसने कहा है धब्बेदार बोहोत 
ज़र्द ही ज़र्द देस में है मेरे 
और हरियाली है उस पार बोहोत 

और कितने तू लफ्ज़ माँगेगा
तेरी जुबां पे हैं उधार बोहोत 
सच कहोगे तुम झूठी दुनिया से 
हैं इरादे तेरे ख़ूंखार बोहोत

घाव अपने तो कम ही दिखलाना 
मिलेंगे तुझको सलाहकार बोहोत 
तेरे नसीब में लिखा क्या है 
ये बताने को हैं तैयार बोहोत 

फ़िक्र मेरी तो तुम ही करते हो 
तुमसे देखे हैं होश-ए-यार बोहोत 
वो ही जीतेगा अबकी बार यहाँ 
जिसने देखी है अपनी हार बोहोत

मैं न आऊंगा बाज़ आदत से 
इस ग़ज़ल में भी हैं अशआर बोहोत
अब कहीं जाना इतने बरसों में 
हैं यहाँ पर भी कलमकार बोहोत 

Tuesday, August 27, 2024

अच्छा नहीं लगता

अब तुमसे मुझे मिलना अच्छा नहीं लगता 

ये बात तुमसे कहना भी अच्छा नहीं लगता 

पर ये भी तो अच्छा नहीं लगता जो ना मिलूँ 

फिर मिल के बिछड़ना भी तो अच्छा नहीं लगता 


तुमने कहा शायद तभी मिलने चले आये 

पर सच तो है के हमसे भी अब रहा नहीं जाए 

वादा किया है तुझसे के होंगे ना अब जुदा 

वादे से मुकरना भी तो अच्छा नहीं लगता 


हैरत नहीं होती है मुझे इस जहान से 

कितने ही जा चुके हैं यहाँ अपनी जान से 

क्या फ़ायदा मिलेगा अगर हम ही ना रहे  

इस बात से डरना भी तो अच्छा नहीं लगता 

Monday, August 26, 2024

बाज़ आएंगे नहीं

मुस्कुराएंगे 
बहल जाएंगे 
आज़माएंगे 
फिर सताएंगे 
वो बुलाएंगे  
हम ना जाएंगे 
यूँ दिखाएँगे 
ख़ार खाएंगे
तिलमिलायेंगे 
रूठ जाएंगे 
दिल दुखायेंगे 
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बाज़ आएंगे नहीं 
रंजिश ही सही
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ठग

Bahr: 221 2122 221 2122

दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 
करना तेरा वज़ाहत लाज़िम है यार लेकिन 
आँखें तुम्हारी पढ़ कर कुछ और लग रहा है

इस बार कुछ न कहना बस बात मेरी सुनना 
हर बार की तरह ये बेकार लग रहा है  

कितने ही शायरों ने शब्बाब-ए-ज़िंदगी की 
हब्बाब ज़िंदगी का कुछ और लग रहा है 

ज़ाहिर सी बात है ये मालूम है मुझे भी 
बातों से मेरी उनको कुछ और लग रहा है 

ये रासते ठिकाना पहचान के हैं मेरे 
आते थे हम यहाँ पर अक्सरहाँ लग रहा है 



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दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 
करना तेरा वज़ाहत लाज़िम है यार लेकिन 
आँखें तुम्हारी पढ़ कर कुछ और लग रहा है 

इस बार कुछ न कहना बस बात मेरी सुनना 
हर बार की तरह ये बेकार लग रहा है 

कितने ही शायरों ने शब्बाब-ए-ज़िंदगी की 
हब्बाब ज़िंदगी का कुछ और लग रहा है 

ज़ाहिर सी बात है ये मालूम है मुझे भी 
बातों से मेरी उनको कुछ और लग रहा है 

ये जगह ये ठिकाना पहचान के हैं मेरे 
आते थे हम यहाँ पर अक्सरहाँ लग रहा है 

दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...